Saturday, July 15, 2006

फिर याद आई तेरी बिखरी
जिन्दगी की
क्या हुआ अगर तू बिखरने से पहले
समेट न सकी
कहीं तो उस बिखरने मे
कोई फूल मुस्कुराया होगा
व्यंग्य का ही सही
कोई तो कांटा नरम पडा होगा
कटाक्षों का ही सही
उठ सखी उठ
तेरे अन्दर जो बिखरापन है
उसे झिंझोड दे
तेरे अंतर मे वो झंजावात है
जो बिखरेपन के बादल को चीर देगा
बिजली की तेजीसे समेट लेगा
जरूरत है सिर्फ एक किरण की
उठ सखी जिन्दगी फिर
मुस्कुरा रही है।


सुजला मुटाटकर

Thursday, July 13, 2006

कोशिश

एक दिन
मैं बिल्कुल वैसी हो जाऊँगी
जैसी आप चाहते हैं
तभी मिलते हैं
फिलहाल
आप आईना देखिये
खबर पढिये
और मैं
सोये रहने की कोशिश करती हूँ