Saturday, March 18, 2006

क्या फर्क पडता है

मै कौशल्या, मंथरा का अंत करती हूं
मै देवकी पूतना का खून पीती हूं
मै द्रौपदी कर्ण की मृत्यु पर
कुंती के साथ रोती हूं

कोई तो सुनो रे

सुनता है गुरु ज्ञानी
सुनता है सुनता है

मिट्टी को रौन्दती हूं
बरतन बनाती हूं
कविता लिखती हूं
आँसू बहते है
यह कुछ कहते हैं

कोई तो सुनो रे

सुनता है गुरु ज्ञानी
सुनता है सुनता है

नए राज्य की रचना करो
जहां बद्री विशाल है
घटाक़र्ण लोकपाल है

यहाँ ब्रम्ह हत्या के पाप से
शिव की मुक्ति हुई
शिव भक्त द्वारा विष्णु की भक्ति हुई
यहां सब यथावत है
बद्री के साथ केदार नाथ हैं
रसोई लक्ष्मी की है
प्रसाद में तुलसी भी है

लोग भजन सुनते है
अघोरी हँसता है
क्या फर्क पडता है

सुनता है गुरु ज्ञानी
सुनता है सुनता है

क्या फर्क पडता है

जवाब:किस विधुत का प्रकाश हो तुम्

क्या चन्द्रमा कोई नहीं
क़्या सौन्दर्य का काम नहीं
और प्रेरणा,
उसे तो तुम भूल ही गये मित्र

चन्द्रमा में दाग है
क्या यह विकृति है?

भगवान को देने से डरो नहीं
य़ह तो भोग है
इससे भंडारा होगा
समृद्धि कोई विकृति नहीं, अगर बांट ली जाये

नाकाम हो, तो इल्जाम भी होगा
ज़रा झुको ( सलीम)
अपना आप शायद दिख भी जाए

अदालत पर वर्चस्व चाहते हो?
रावण की जीत का ढोल पीट कर ऐलान करते हो
कुतर्क बेचते हो
इसीलिये पीडित लगते हो

सप्रेम

स्मिता

सुनते हो?

आओ भाई घर घर खेलें
अपनी अपनी विरासत मां बाप से ले लें

घर का सौन्दर्य मैने छीना
मुझे माफ करो
अपना दिल साफ करो
जिम्मेदारियां भविष्य की
half half करो

थोडा झुको सलीम
नहीं तो थप्पड मारूंगी

अगर मै रोने लगी तो दुनिया ना बह जाए
लेकिन तुम्हें मारने में मेरी कलाई ही ना टूट जाए

दादा दादी की फोटो मेरी
प्रेम मामा वाला लेमन सेट तुम्हारा
दादी का लहंगा चुनरी तुम्हारी बहू , फिर बेटियों का
छतीसगढिया सींगा तुरही मेरे पति, फिर बेटे का

अम्मा की जमीन तुम्हारा हिस्सा,
पापा तो मुझे मेरा साथ वाला दे ही चुके

अर्जुन गायत्री और दुर्गा भी
कभी घर घर खेलें
अनुपम को भी साथ ले लें

मुझे तुमसे आशा है

लेकिन हर आशा पूरी हो
यह तो ज़रूरी नहीं
ग़ालिब के आगे मैं क्या कहूं
मेरी जुर्रत नहीं

Friday, March 17, 2006

विरोध

मैं काले सूरज का विरोध करती हूं
मैं मनु का राज खत्म करती हूं
इसमें बहुत विकृतियां हैं

मैं गुणवंती
सौन्दर्य की स्थापना करती हूं
श्याम सुन्दर पर मरती हूं

यहां राजा होंगे रानी
और बच्चे परिवार का हिस्सा

मेरे घर की नेम प्लेट पर
नाम किसी का भी हो
कीर्तन तो चल ही रहा है
बीट्स कोई भी हो

परिवार गुत्थम गुत्था हो जुडा है
लड लड कर ही तो आगे बढा है

पढ पढ कर समृद्ध हुआ है
तो क्या पढाई हमारा पेशा है?

रुदाली हो या रंडी
य़ा मां का आंचल
आँसू हों या सदियों का गरल
इसे तुरंत बहने दो

क्योंकि समय बडा हिंसक है
और तुम राम नहीं केवट हो

अर्पण

समर्पण करते हो
और शर्त रखते हो
समर्पण से डरते हो?
यहां भी युद्ध करते हो

मस्तिष्क से प्रेम करते हो
सीना फाडने से डरते हो

स्मृतियों का श्रेय लेने से कतराओ नहीं
मेरा योगदान झुठ्लाओ नहीं
थोडा सुन्दर थोडा विकृत
मुझे भगवान बनाओ नहीं

यह सूरज केवल सूरज है
इसका अस्त यहीं होगा


मेरी यह कविता समर्पित है मेरे प्रथम कवि को- मेरे पिता डाक्टर देवेन्द्र कुमार शर्मा को जिन्हें मेरी दादी गुणवंती देवी और मेरे दादा श्याम सुन्दर प्यार से राजा बुलाते थे.

य़हां स्वागत है है उन सब सूर्य पुत्रों का जो अस्त हुए
जिन्होंने मेरे अन्दर के आदमी को रोना सिखाया.

बेटा मैं हर दिन तुम्हारे लिये रो रहा हूँ
लेकिन और रोने से धरती बह जाएगी
मेरी मजबूरी को समझो
जीने के लिये काम ज़रूरी है
हंसना मेरी मजबूरी है
झूठ बोलना पाप है
और नहीं भी
जिन्दगी में हार है
और नहीं भी
मेरे अर्पण को गृहण करो
स्त्रियों को तर्पण करने दो
काले सूरज को ढलने दो
मोक्ष की राह पर चलने दो
मुझे बताना ज़रूर
कि तुम क्या सोच रहे हो
बातचीत से सम्बन्ध बढते ही हैं
मृत लोग भी बात करते हैं
तुम्हें हम याद करते हैं
तुम्हारा श्राद्ध करते हैं

मृत समाज को भी स्वीकार करते हैं

Thursday, March 16, 2006

समर्पण

सिर तुम्हारे सामने अपना झुका दूं मैं यदि
आश्वस्त करती हो मुझे, अभिमान बक़्शोगी मेरा?

सौंप दूं तुमको हृदय, सोचे बिना, समझे बिना
क्या कौल देती हो मुझे, सम्मान रखोगी मेरा?

इष्ट तुमको मान लूं, और प्रश्न ना पूछूं कोई,
क्या वचन देती हो मुझे, उत्तर मुझे दोगी सदा?

सीता तुम्हारे होने की जो शर्त ना रखूं कभी,
स्वीकार होगा क्या तुम्हें श्री राम ना होना मेरा?

अर्जुन

कर्ज़ से डरना

तुम अहिल्या के राम बन के आये
मैं बन गई सीता
अपनी शक्ति से डरना

तुमने चाही नाव
मैने तुम्हें केवट बना दिया
मेरी शक्ति से डरना

मैं केवट बनना चाहती हूं
मेरी भक्ति से डरना
समाज की शक्ति से डरना

कहीं मुझे सीता और तुम्हें राम न बना दे

धरती फट गई और मैं उसमें समा गई हूं

तुम समाज को सागर बना दो
मोज़ज के सामने समुद ने राह खोली थी
और रस्ता बन गया था

राम ने समुद्र को डराया था
धनुष की शक्ति से डरना

मेरा बेटा तुम्हारी मां पर वार न करे
तुम उसकी मां पर वार न करना
उससे सिर्फ प्यार करना

प्यार को कर्ज़ समझने से डरना
फर्ज़ समझ कर प्यार न करना

Wednesday, March 15, 2006

मै रहने आई

जानती नहीं कहां

दिल में शायद?
लेकिन दिल तो तोड़ दिये जाते हैं
इनमें घर बनाना खतरनाक है

दिमाग में शायद?
लेकिन दिमाग तो बिगड जाते हैं
फिर बिगडे घर में कौन रहना चाह्ता है

पागल प्रेमी गायब हो गये हैं
युद्धरत हैं शायद
या नौकरी करने लगे हैं
या कर्ज़ चुका रहे हैं

मैं घायल हूं
लगता है पत्थर ज़्याद पड गए
चट्टनों से दबाया गया है शायद

दब कर मर जाऊं?

संत बन समाधिस्थ हो जाऊं?

काले सूरज में खो जाऊं

शायद यही अस्त नहीं होगा

जवाब: "युद्ध"

अर्जुन, लोभ से डरना
लोभ से आती है मह्त्वाकांक्षा
द्रोण की महत्वाकांक्षा ने एकलव्य का अंगूठा मांग लिया
उस विद्या की गुरुदक्षिणा
जो उसे दी भी नहीं थी
वह नीचे दर्जे का आदमी था

द्रोण ने पाडवों को लाक्षागृह पहुंचा दिया
उस अर्जुन का प्रेम भी उन्हें नहीं रोक पाया
जो उनका प्रिय था

और महत्वाकांक्षा थी वर्चस्व की
वर्चस्व की चाह से डरना अर्जुन
वर्चस्व केवल वासुदेव का सुन्दर है
सौन्दर्य खोजो अर्जुन


स्मिता

वे रहने आयीं

मेरी मां को आज कल सिमोन दि बुवुआर की कथा "She Came To Stay" से काफी लगाव सा है. आज कल वे मेरे घर रहने आयीं हुईं हैं. कुछ जवाब कविताओं के उन्होने भी दिये हैं. स्वागत है मेरी मां श्रीमती स्मिता चौधरी का.

Tuesday, March 14, 2006

किस विद्युत का प्रकाश

किस विद्युत का प्रकाश हो तुम
जिसमे तपन का नाम नहीं
इतना शीतल इतना पावन
जिसका कोई दाम नहीं

हे प्रकाश हे शत्रु मेरे
मत मुझको तुम यों ताने दो
वीरगति है सरल उपाय
ताने सुनना आसान नहीं

शत्रु पराजित किया है तुमने
पर पौरुष अपराजित है
पौरुष स्मृतियों में रहता है
स्मृतियों का कोई धाम नहीं

मेरे जैसी विकृत बुढि
वाले मानव जानते हैं
के स्मृतियों को मिटा सके
ऐसा कोई भगवान नहीं

प्रभु प्रकाश से मुझे बचाओ
चाहे ले लो स्मृतियां सारी
पर वेतन पर भगवान को रखना
भक्ति की पहचान नहीं

तो प्रभु को मैं कुछ ना दूंगा
पर उससे सब मांगूंगा
क्यूं मोक्ष खरीदूं किश्तों में
मेरा भगवान दुकान नही

तुम दोषी मुझको कहते हो
मैं तर्क तुम्हारे सुनता हूं
पर मेरे न्यायालय में
मुझ पर कोई इल्जाम नहीं

हाँ आज तुम्हारे आगे हूं मैं
कुछ हद तक नाकाम सही
पर याद रहे, रामायण में भी
जीता रावण , राम नहीं

अर्जुन

Wednesday, March 01, 2006

युद्ध

हृदय और मस्तिष्क की सीमा पे जैसे जंग है,
जो समाधि थी लगी, अब वह समाधि भंग है


छोड़ना चाहूं भी तो छोड़ूं किसे मैं हे प्रभू,
हृदय और मस्तिष्क दोनो मेरे ही तो अंग हैं


चाहा था जो, वह मिल रहा, फिर भी हृदय व्याकुल मेरा
काल की लीला को जैसे देख वह भी दंग है


कोई उपेक्षित वर्ग मानो, या कोई भिक्षुक कहो
जाग उठा अभिमान जिसका, भाग्य फिर भी तंग है


और मेरा मस्तिष्क, जिसकी राह में जो भी खड़ा
तोड़ देता वह उसे, चाहे वह उसके संग हैं


निर्लज्जता की हद तो देखो, हृदय की, मस्तिष्क की
एक ही तन में हैं लेकिन, दो अलग ही रंग हैं


विजय तो मस्तिष्क की निश्चित है, इसमे शक नहीं
हृदय के शस्त्रों पे क्योंकि, लोभ का अब ज़ंग है


अर्जुन

अचेतना की विजय

मूढ़्ता पे तालियों की सील जैसे ठोकते,
ये जानते नहीं हैं अपनी पींठ मे हैं भोंकते


वो बदनुमा कटारी, जो काट दे हृदय को,
वो तीर इतना पैना, जो चीर दे समय को


देखते हैं रोज़ अपने आप की ही मृत्यु जैसे,
सोते हुए के वक्ष पर हो काल का वो नृत्य जैसे


अंधकार को ये भोर का प्रकाश कहते हैं
मुक्ति की तलाश में, अचेतना में बहते हैं


-अर्जुन

आक्रोष की समाधि

कांधे से मैने अपने गुस्से की लाश बांधी
आगे मेरे क्षितिज है, पीछे मेरे है आंधी
मैं सोचता हूं पूरी, कहता हूं बात आधी
मैं क्रोध की कब्र हूं, आक्रोष की समाधि


-अर्जुन्

अभियांत्रिक और सैनिक

संगणक को ताकते, काले कहवे के खाली प्याले को टटोलता मैं,
और बंदूक् की नली से बारूद की जमी हुई परत को साफ करते तुम.
क्या हम इतने अलग हैं?
तुम्हारा लक्ष्य: भय से मुक्ति, मेरा लक्ष्य: भय से मुक्ति
तुम्हारा कर्तव्य: रक्षा, मेरा कर्तव्य: यह देखना की तुम्हारे पास रक्षा करने योज्ञ कुछ हो
क्या हम इतने अलग हैं?
ब्रम्हा, विष्णु और शंकर की त्रिमूर्ति में, तुम कौन, मै कौन?
क्या तुम शिव? क्योंकि तुम भस्म करने की शक्ति रखते हो?
या मैं विष्णु, क्योंकि मैं सम्भालना जानता हूं?
या कोई ब्रम्हा? क्योंकि वह निर्माता है?
या, हम सब ही तीनों?
क्योंकि हम बनाना, सम्भालना, और उजाडना, सभी जनते हैं?
हमारी दृष्टि के कोण भले ही भिन्न हों
लेकिन मित्र, तुम और मैं,
हम अभिन्न हैं


-अर्जुन

विश्वास

एक थी साई
विश्वास की जाई
बोली
मेरे भगवन तुम महान हो
सभ्य हो
सत्य हो
सैर भी हो
भ्रम तो नहीं हो?
विश्वास ने दिया धोखा
भ्रम ने हाथ थामा
चली साई उसके आसरे
बोली भगवन तुम महान हो
वैध हो
अवैध हो
असम्भव हो
भ्रम ने छोडा साथ
साई गिरी, फिर उठी
वैध के सहारे
झेले अंगारे
खाये क्षण
अवैध के साथ हो ली
बोली मेरे भगवन तुम महान हो
विश्वास, भ्रम, वैध अवैध
सब को लेकर
मैं तेरे पीछे
मैं साई विश्वास की जाई
तुझमें समाने चली आई
ये कोई भ्रम तो नहीं?


- सुजला मुटाटकर

जवाब: "राम और रावण" को


न मैं राम न तुम रावण

आत्मसम्मान से पहले जरूरी है आत्म निरीक्षण

लौकिक सम्मान तो मिल ही जाएगा

अहिल्या उद्धार या शूपर्णखा की नाक के बदले ही सिर्फ

सामाजिकता नहीं मिलेगी

राम को असामाजिकता का नाश करना होगा

उसके लिये रावण होने की जरूरत नहीं

आज छल से छुप कर बाली को मारने की भी आवश्यकता नहीं

हर दिन तो खुले आम राम मर रहा है

चाहे धनुश उठाओ या कैलाश

राम और रावण दोनो ही दयनीय हैं

-सुजला मुटाटकर

काला सूरज में स्वागत है...

यह गाथा जो मैने कविता के ज़रिये हृदय के भाव व्यक्त करने के लिये आरंभ की थी, अब वेग सा पकड़ रही है.
काला सूरज जीवनवाहिनी में स्वागत है, श्रीमती सुजला मुटाटकर का, जिन्होने न सिर्फ मुझे "राम और रावण" का जवाब दिया, बल्कि मुझे विश्वास के बारे में कुछ सुन्दर तथ्य भी दिखाये.

राम और रावण

तुम राम, मैं रावण। तुम सामाजिक , मैं असामाजिक। तुम राम, मैं रावण।
तुम्हारे लिये आवश्यक, लौकिक सम्मान। मेरे लिये आवश्यक, आत्मसम्मान।


तुम्हारे लिये आवश्यक अहिल्या का उध्धार। मेरे लिये आवश्यक शूर्पणखा की नाक का बदला।

तुम राजा के पुत्र जो ब्राह्मण बने। मै ब्राह्मण पुत्र जो राजा बना।

तुमने शिव का धनुष उठाया। मैने शिव का कैलाश उठा लिया।

तुमने छल से, छुप कर बाली को मारा। मैं खुलेआम, बल से लड़ कर बाली से हारा।

तुम हर साल अपनी छल से जीती हुई विजय का डंका बजाते हो। मैं हर साल सारी दुनिया
के पाप उठाये जल जाता हूं।

फिर तुम कैसे राम, और मैं क्यों रावण?

-अर्जुन