क्या फर्क पडता है
मै देवकी पूतना का खून पीती हूं
मै द्रौपदी कर्ण की मृत्यु पर
कुंती के साथ रोती हूं
कोई तो सुनो रे
सुनता है गुरु ज्ञानी
सुनता है सुनता है
मिट्टी को रौन्दती हूं
बरतन बनाती हूं
कविता लिखती हूं
आँसू बहते है
यह कुछ कहते हैं
कोई तो सुनो रे
सुनता है गुरु ज्ञानी
सुनता है सुनता है
नए राज्य की रचना करो
जहां बद्री विशाल है
घटाक़र्ण लोकपाल है
यहाँ ब्रम्ह हत्या के पाप से
शिव की मुक्ति हुई
शिव भक्त द्वारा विष्णु की भक्ति हुई
यहां सब यथावत है
बद्री के साथ केदार नाथ हैं
रसोई लक्ष्मी की है
प्रसाद में तुलसी भी है
लोग भजन सुनते है
अघोरी हँसता है
क्या फर्क पडता है
सुनता है गुरु ज्ञानी
सुनता है सुनता है
क्या फर्क पडता है
