Thursday, May 11, 2006

विगत राग की रागिनी

विगत राग की रागिनी है ये जीवन
मन्द्र मधय तार
आरोह अवरोह सभी है,
कैसे झंकार हो तारों से
जब कोमल और तीव्र
बेसुरे लगते हो?
जीवन मे रिशभ है
तो धैवत भी है
गन्धार है तो निशाद भी है
कोमल और तीव्र के झगडे मे
सरगम अधूरी है.
मैने संगीत साधना की
ध्रुपद और खयाल दोनो ही गाये
पर जीवन मे तराना न ला सकी
किसको दोष दू
स्वरोंको या रागों को?
लगता है जीवन का संगीत
शायद अधूरा ही रहेगा.
. सुजला मुटाटकर

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