Saturday, December 08, 2007

मै और कोई

एक सोच हूँ मै

खाली एक सोच


एक़ संपूर्ण सोच हो जाने की चाह में


अधूरेपन से जूझते जूझते

थक जाने पर


हाथ बढा कर माँग लेने से

या हाथ बढा कर छीन लेने पर


आइना दिखा देता है

और कोई


अचानक


प्रेम की प्रतिमूर्ति कह कर

पूर्णता का आभास करा देता है

और कोई

Saturday, July 15, 2006

फिर याद आई तेरी बिखरी
जिन्दगी की
क्या हुआ अगर तू बिखरने से पहले
समेट न सकी
कहीं तो उस बिखरने मे
कोई फूल मुस्कुराया होगा
व्यंग्य का ही सही
कोई तो कांटा नरम पडा होगा
कटाक्षों का ही सही
उठ सखी उठ
तेरे अन्दर जो बिखरापन है
उसे झिंझोड दे
तेरे अंतर मे वो झंजावात है
जो बिखरेपन के बादल को चीर देगा
बिजली की तेजीसे समेट लेगा
जरूरत है सिर्फ एक किरण की
उठ सखी जिन्दगी फिर
मुस्कुरा रही है।


सुजला मुटाटकर

Thursday, July 13, 2006

कोशिश

एक दिन
मैं बिल्कुल वैसी हो जाऊँगी
जैसी आप चाहते हैं
तभी मिलते हैं
फिलहाल
आप आईना देखिये
खबर पढिये
और मैं
सोये रहने की कोशिश करती हूँ

Wednesday, June 14, 2006

ये जीना भी कोई जीना है

वह पैदा ही बीमार था
मरने को तैयार था
जीने को लाचार था
वह मेरा संसार था
मुझे उससे बहुत प्यार था
फिर हमारा परिवार था

वह बच गया
जीवन की लडाई लडने
हमारी खुशियों का हनन करने

जी भी रहा है मर मर के
डर डर के

क्या करें
उसे खुद में विश्वास नहीं
और हम उसके पास नहीं
साँस तो है पर आस नहीं

Friday, May 19, 2006

दुष्ट राक्षस की सफेद परी

वो तो गये
अकेला कौन?

तुम परी रहो या बनो बुरी
लल्लू चाचा की थीं तुम धुरी
तुम जाओगी तो तुम्हें भी
यूं ही याद करेंगे

तुम्हें हमने उसकी नज़र से देखा
अब अपनी आँखें खोलेंगे
तुम्हें
तुम्हारे तराजू पर ही तौलेंगे


हमारा साथ दोगी निर्मला जी
नन्ही, मैडम और अम्मा जी
तुम हमारा ध्यान रखना
हम तुम्हें प्यार करेंगे

लेन देन का रिवाज है
यही सभ्य समाज है



स्मिता चौधरी

Thursday, May 11, 2006

विगत राग की रागिनी

विगत राग की रागिनी है ये जीवन
मन्द्र मधय तार
आरोह अवरोह सभी है,
कैसे झंकार हो तारों से
जब कोमल और तीव्र
बेसुरे लगते हो?
जीवन मे रिशभ है
तो धैवत भी है
गन्धार है तो निशाद भी है
कोमल और तीव्र के झगडे मे
सरगम अधूरी है.
मैने संगीत साधना की
ध्रुपद और खयाल दोनो ही गाये
पर जीवन मे तराना न ला सकी
किसको दोष दू
स्वरोंको या रागों को?
लगता है जीवन का संगीत
शायद अधूरा ही रहेगा.
. सुजला मुटाटकर

Tuesday, May 09, 2006

सावन गीत

हम कबहुं न जाएंगे अम्मा के

नाती को दीनी पूरी
बलम को दीने रोट
हमका दे दिये सूखे ठीकरा
हो, हम कबहुं न जाएंगे अम्मा के

पोती को दीनी पायल
बहू को दीने कँगना
हमका दे दिये धक्के चार
हो, हम कबहुं न जाएंगे अम्मा के

बँधुआ हमरे बाबुल
और सेवक हमरे भाई
हमरी खो गईं गुइयाँ ब्याह के
हम कबहुं न जाएंगे अम्मा के

राम नाम सत्य हो

हे भगवान
लडकी पैदा न होने पाये
इंसान ज़रूर जाँच कराये
लडकी गर्भ में ही मार दी जाये

बाकी के सारे अरमान पूरे कर चुकी
ये हसरत अधूरी न रह जाये

मस्तिष्क का व्यापार करके वेश्या मै बन चुकी
घरों को तोडने वाले
तू हृदय से भिखारी बन जाये
गाली तो मै दे चुकी
अब श्राप देती हूं
तुझे बडी उमर लग जाये
तू अपनी जी चुका
तुझे मेरी उमर लग जाये

तूने मेरा हर सपना तोडा
तुझे मै माफ़ करती हूं
जीते जी तेरा श्राद्ध मैं करती हूं
भगवान से मुझे
जीवन ही में मोक्ष मिल जाये

जिनके सपने खो गये हैं
मेरे सपने उनके हो जाएं